कागजों में आ गया लो फिर नया एक वर्ष
पर नहीं आया है जीवन में कोई नव हर्ष !
चलती जाती जिंदगी, यूँ ही समय की धार पर
बढती जाती गलतियाँ , इस जिंदगी की राह पर !
आज जो लगता सही है ..और लगता है सुखद
वो ही अक्सर कल गलत होकर ले आता है दरद !
जिंदगी की ये कहानी ..यूँ ही चलती है हर वर्ष
फर्श से चिपकी निगाहें ..देख न पाती क्यूँ अर्श !
कोरे शुभ संदेशों से ..ना आ पाए जीवन में हर्ष
वही मंजिलें ,वही रास्ते .. कैसे आये नव उत्कर्ष ?
बंद द्वार सब ,बंद इन्द्रियाँ ...कैसे हो उसका स्पर्श
उसका परस नहीं हो जब तक .. तब तक कैसा हर्ष ?
प्रभु करे बीते वर्षों की ... तरह नहीं बीते ये वर्ष
कोई नव संकल्प जगे ... और सच में आये नूतन वर्ष !
तन मन से प्रयास हो सच्चा .. हो जाये उसका स्पर्श
उसकी अनुकम्पा हो ऐसी .. मिट जाये अंतर संघर्ष !!!
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