हे प्रभु ! फिर आओ
ना
गीत नव , नव साज लेकर
कोई नव अंदाज लेकर
तमस जो गहरा हुआ है
फिर उसे हटाओ ना !
हे प्रभु ! फिर आओ ना !
कितने अर्जुन दिग्भ्रमित हैं ,
कितने अर्जुन राह भटके ,
कैसे कैसे कुरुक्षेत्रों में
आज सारे लोग अटके ,
राह मिल जाए सही
फिर ऐसा गीत सुनाओ ना !
हे प्रभु ! फिर आओ ना !
सच्चे हृदय से बुलाता तुझे ,
लेकिन ये खयाल है आता मुझे ,
अब भी तुम बार बार आते हो
लेकिन शायद यूँ ही लौट जाते हो !
उन दिनों तेरे लिए भी
काम ये आसान था !
पास था अर्जुन
सो तूने दे दिया व्याखान था !
आज के दौर में अगर आते ...
तो वैसा अर्जुन खोजने कहाँ जाते ?
सुन सके जो बात तेरी ...
गुन सके जो बात तेरी ...
शरण में आ जाये तेरी ....
ऐसा अर्जुन कहाँ पाते ?
गीत नव , नव साज लेकर
कोई नव अंदाज लेकर
तमस जो गहरा हुआ है
फिर उसे हटाओ ना !
हे प्रभु ! फिर आओ ना !
कितने अर्जुन दिग्भ्रमित हैं ,
कितने अर्जुन राह भटके ,
कैसे कैसे कुरुक्षेत्रों में
आज सारे लोग अटके ,
राह मिल जाए सही
फिर ऐसा गीत सुनाओ ना !
हे प्रभु ! फिर आओ ना !
सच्चे हृदय से बुलाता तुझे ,
लेकिन ये खयाल है आता मुझे ,
अब भी तुम बार बार आते हो
लेकिन शायद यूँ ही लौट जाते हो !
उन दिनों तेरे लिए भी
काम ये आसान था !
पास था अर्जुन
सो तूने दे दिया व्याखान था !
आज के दौर में अगर आते ...
तो वैसा अर्जुन खोजने कहाँ जाते ?
सुन सके जो बात तेरी ...
गुन सके जो बात तेरी ...
शरण में आ जाये तेरी ....
ऐसा अर्जुन कहाँ पाते ?
सर्वज्ञ हो ना
!
सो पहले ही जानते थे ...
इसीलिए आ गए
सतयुग, द्वापर और त्रेता युग में !
वरना आज के
इस नेता और अभिनेता युग में ..
गीता कहाँ और किसको सुनाते ?
इतने चैनलों के सामने क्या तुम टिक पाते ?
तुम बाँटते हो ज्ञान और ध्यान ....
जिससे मिटे आदमी का अज्ञान ।
दिखाते तुम जिस सत्य की राह ..
उसकी यहाँ किसको है चाह ?
लेकिन इंसान जाने न जाने
तुम तो जानते हो ....
ये टीवी के चैनल और व्हिस्की के गिलास
इनसे बँधती है केवल झूठी आस ।
हे दया निधान,
तूने बनाया आदमी महान
पर ये भूला सार असार की पहचान ।
तुम ही खोलो इसके मन के द्वार ....
पी सके ये तेरा अमृत
खोलो कोई ऐसा (bar ) बार ।
मिट जाए इस मन की तृष्णा
ऐसी मुरली बजाओ कृष्णा ...
छेड़ के कोई तान निराली
झूठा ज्ञान हटाओ ना !
हे प्रभु ! फिर आओ ना !!!!
सो पहले ही जानते थे ...
इसीलिए आ गए
सतयुग, द्वापर और त्रेता युग में !
वरना आज के
इस नेता और अभिनेता युग में ..
गीता कहाँ और किसको सुनाते ?
इतने चैनलों के सामने क्या तुम टिक पाते ?
तुम बाँटते हो ज्ञान और ध्यान ....
जिससे मिटे आदमी का अज्ञान ।
दिखाते तुम जिस सत्य की राह ..
उसकी यहाँ किसको है चाह ?
लेकिन इंसान जाने न जाने
तुम तो जानते हो ....
ये टीवी के चैनल और व्हिस्की के गिलास
इनसे बँधती है केवल झूठी आस ।
हे दया निधान,
तूने बनाया आदमी महान
पर ये भूला सार असार की पहचान ।
तुम ही खोलो इसके मन के द्वार ....
पी सके ये तेरा अमृत
खोलो कोई ऐसा (bar ) बार ।
मिट जाए इस मन की तृष्णा
ऐसी मुरली बजाओ कृष्णा ...
छेड़ के कोई तान निराली
झूठा ज्ञान हटाओ ना !
हे प्रभु ! फिर आओ ना !!!!
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